मानवीय नियति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अंतर्संबंधों का अध्ययन करने वाला वैदिक ज्योतिष शास्त्र न केवल भविष्यवाणियों का एक समूह है, बल्कि यह समय और कर्म के सूक्ष्म विज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रतिवेदन में, astromadhupriya के विशेषज्ञों द्वारा संकलित शोध के माध्यम से, हम कुंडली के विभिन्न जटिल योगों, उनकी सत्यता और उनके मानवीय जीवन पर पड़ने वाले गहन प्रभावों का विश्लेषण करेंगे। ग्रहों की स्थिति और उनके पारस्परिक संबंधों से उत्पन्न होने वाले शुभ और अशुभ योग जीवन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिसका सूक्ष्म विवरण यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

कुंडली की सत्यता और प्रारब्ध कर्म का सिद्धांत
ज्योतिष शास्त्र में सबसे मूलभूत प्रश्न यह उठता है कि क्या कुंडली में लिखा हुआ सच होता है। astromadhupriya के शोधकर्ताओं का मत है कि जन्म कुंडली व्यक्ति के पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का एक मानचित्र है, जिसे ‘प्रारब्ध’ कहा जाता है। जब एक शिशु जन्म लेता है, तो उस विशेष समय और स्थान पर ग्रहों की जो स्थिति होती है, वह उसकी आत्मा के इस जीवन के उद्देश्यों और चुनौतियों को दर्शाती है।

कुंडली की सत्यता को गणितीय सटीकता और खगोलीय गणनाओं के माध्यम से सिद्ध किया जा सकता है। astromadhupriya के अनुसार, कुंडली कोई जादुई दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा के उन पैटर्नों का विवरण है जो व्यक्ति के स्वभाव, स्वास्थ्य और जीवन की घटनाओं को प्रभावित करते हैं। यद्यपि प्रारब्ध को पूरी तरह से बदलना कठिन है, लेकिन ‘पुरुषार्थ’ और ‘उपचारों’ के माध्यम से उनके प्रभाव की तीव्रता को कम या अधिक किया जा सकता है। इस प्रकार, कुंडली एक मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करती है जो व्यक्ति को उसके जीवन के संभावित उतार-चढ़ाव के प्रति सचेत करती है।

कर्म का प्रकार,परिभाषा,कुंडली में भूमिका
संचित कर्म,पिछले कई जन्मों के एकत्रित कर्म,वह भंडार जिससे वर्तमान जीवन के लिए कर्म चुने जाते हैं
प्रारब्ध कर्म,वह हिस्सा जो इस जीवन में भोगना तय है,कुंडली में ग्रहों की स्थिति के रूप में परिलक्षित
क्रियमाण कर्म,वर्तमान जीवन में किए जा रहे कार्य,भविष्य की कुंडली और प्रारब्ध का निर्माण

Astromadhupriya के विश्लेषण के अनुसार, कुंडली की भविष्यवाणियों की सटीकता ज्योतिषी की गणना क्षमता और जातक के जन्म समय की शुद्धता पर निर्भर करती है। जब ग्रहों की दशाएं और गोचर कुंडली के योगों के साथ संरेखित होते हैं, तो घटनाएं घटित होने की संभावना अत्यधिक प्रबल हो जाती है।

अनन्त कालसर्प योग: वित्तीय तनाव और मानसिक द्वंद्व
कालसर्प योग आधुनिक ज्योतिष में एक अत्यंत चर्चित और संवेदनशील विषय है। यह तब बनता है जब राहु और केतु के बीच सभी सात मुख्य ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) आ जाते हैं। astromadhupriya के शोध पत्र के अनुसार, अनन्त कालसर्प योग तब बनता है जब राहु प्रथम भाव (लग्न) में और केतु सप्तम भाव में स्थित हो।

यह योग व्यक्ति के व्यक्तित्व और उसके संबंधों के अक्ष पर स्थित होता है, जिसके कारण जीवन में भारी उथल-पुथल की स्थिति बनी रहती है। राहु का लग्न में होना व्यक्ति को अत्यधिक महत्वाकांक्षी लेकिन भ्रमित बना देता है, जबकि केतु का सातवें भाव में होना साझेदारी और वैवाहिक जीवन में अलगाव या असंतोष का कारण बनता है। astromadhupriya का शोध इंगित करता है कि अनन्त कालसर्प योग से पीड़ित व्यक्तियों को निरंतर वित्तीय तनाव का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उनकी आय के स्रोत अस्थिर रहते हैं और निवेश में अक्सर हानि होती है।

वित्तीय तनाव के ज्योतिषीय और मनोवैज्ञानिक कारण
अनन्त कालसर्प योग केवल धन की कमी का संकेत नहीं है, बल्कि यह धन के प्रबंधन में आने वाली मनोवैज्ञानिक बाधाओं को भी दर्शाता है। astromadhupriya के अनुसार, राहु की दृष्टि जब पंचम, सप्तम और नवम भाव पर पड़ती है, तो यह जातक की निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति जोखिम भरे निवेशों की ओर आकर्षित होता है जिससे भारी वित्तीय नुकसान की संभावना बढ़ जाती है।

प्रभाव का क्षेत्र,राहु/केतु की स्थिति,परिणाम (astromadhupriya विश्लेषण)
स्वास्थ्य,लग्न में राहु,”अज्ञात भय, मानसिक चिंता, सिरदर्द”
वित्त,द्वितीय और एकादश भाव पर राहु का प्रभाव,”संचित धन की हानि, आय में उतार-चढ़ाव”
विवाह,सप्तम भाव में केतु,”जीवनसाथी के साथ वैचारिक मतभेद, विवाह में विलंब”
करियर,दशम भाव पर राहु की छाया,”कार्यस्थल पर षड्यंत्र, बार-बार नौकरी बदलना”

अनन्त कालसर्प योग के निवारण हेतु प्रभावी उपाय
astromadhupriya के विशेषज्ञों ने इस योग के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए विशिष्ट उपचारों का सुझाव दिया है। इन उपायों का उद्देश्य राहु की नकारात्मक तरंगों को शांत करना और जातक की ऊर्जा को संतुलित करना है।

महामृत्युंजय मंत्र का जप: राहु के मानसिक और शारीरिक दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए भगवान शिव की उपासना सर्वोपरि मानी गई है।
द्रव्य अर्पण: बहते पानी में कोयला या सीसा (सिक्का) प्रवाहित करना राहु की भारी ऊर्जा को विसर्जित करने में सहायक होता है।
दान: शनिवार के दिन काले तिल, काला कंबल या लोहे की वस्तुओं का दान करने से शनि के माध्यम से राहु के दोषों में कमी आती है।
रुद्राभिषेक: ज्योतिर्लिंगों पर या स्थानीय शिवालयों में रुद्राभिषेक करवाने से कालसर्प दोष की शांति होती है और आर्थिक मार्ग प्रशस्त होते हैं।

astromadhupriya का मानना है कि इन उपायों को पूर्ण श्रद्धा और नियमितता के साथ करने से जातक के जीवन में धीरे-धीरे स्थिरता आने लगती है और अनन्त कालसर्प योग की प्रतिकूलता कम हो जाती है।

कालंतक योग: ज्योतिष शास्त्र का अनकहा सच
कालंतक योग एक ऐसा योग है जिसके बारे में पारंपरिक ग्रंथों में कम लेकिन गूढ़ चर्चा मिलती है। इसे अक्सर समय और आयु से संबंधित बाधाओं के रूप में देखा जाता है। astromadhupriya के शोध के अनुसार, जब राहु और केतु की स्थिति कुंडली के मारक भावों (द्वितीय और सप्तम) या अष्टम भाव के साथ प्रतिकूल संबंध बनाती है, तो कालंतक योग की स्थिति उत्पन्न होती है।

“अनकहा सच” यह है कि कालंतक योग केवल मृत्यु का सूचक नहीं है, बल्कि यह जीवन के महत्वपूर्ण अवसरों के ‘काल’ यानी समय के अंत को दर्शाता है। astromadhupriya के विश्लेषण से पता चलता है कि इस योग के प्रभाव में व्यक्ति को ऐसे झटके लगते हैं जो उसकी प्रगति को अचानक रोक देते हैं। यह योग व्यक्ति को समय की महत्ता सिखाता है और उसे आध्यात्मिक परिवर्तन की ओर धकेलता है।

कालंतक योग की उपस्थिति में जातक को स्वास्थ्य संबंधी पुरानी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है जो अचानक उभरती हैं। astromadhupriya के अनुसार, इस योग के प्रभाव को कम करने के लिए कालभैरव की पूजा और महाकाल की शरण में जाना सबसे प्रभावी माना गया है। यह योग व्यक्ति को भौतिकता से परे देखने के लिए मजबूर करता है, जो अक्सर एक दर्दनाक लेकिन आवश्यक विकास प्रक्रिया होती है।

षडष्टक योग: ग्रहों के बीच शत्रुता और संघर्ष
षडष्टक योग ज्योतिष शास्त्र के सबसे चुनौतीपूर्ण योगों में से एक है, जो दो ग्रहों के बीच 6/8 के संबंध से बनता है। इसका अर्थ है कि एक ग्रह दूसरे से छठे भाव में है और दूसरा पहले से आठवें भाव में। astromadhupriya के अनुसार, यह स्थिति ग्रहों के बीच ऊर्जा के प्रवाह को अवरुद्ध कर देती है, जिससे संघर्ष, रोग और शत्रुता की स्थिति उत्पन्न होती है।

छठा भाव रोगों, ऋणों और शत्रुओं का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि आठवां भाव मृत्यु, अचानक परिवर्तन और गहरे संकटों का। जब दो मित्र ग्रह भी षडष्टक संबंध में होते हैं, तो वे एक-दूसरे को लाभ पहुँचाने में असमर्थ हो जाते हैं। astromadhupriya के शोध में पाया गया है कि मंगल और शनि का षडष्टक योग सबसे खतरनाक होता है, क्योंकि यह दुर्घटनाओं और गंभीर चोटों का कारण बनता है।

ग्रहों की जोड़ी,षडष्टक का स्वरूप,संभावित परिणाम
सूर्य और शनि,नैसर्गिक शत्रुता,”पिता-पुत्र में विवाद, सरकारी बाधाएं, हड्डी के रोग”
चंद्रमा और बुध,भावनात्मक बनाम बौद्धिक,”निर्णय लेने में भ्रम, मानसिक अस्थिरता, अनिद्रा”
गुरु और शुक्र,ज्ञान बनाम विलास,”वैवाहिक असंतोष, स्वास्थ्य समस्याएं, मधुमेह”
मंगल और राहु,विस्फोटक ऊर्जा,”कानूनी विवाद, हिंसा, अचानक आने वाली विपत्तियां”

Astromadhupriya के अनुसार, षडष्टक योग की उपस्थिति में कुंडली मिलान करते समय अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। यदि वर और वधू की राशियों के स्वामी एक-दूसरे से षडष्टक भाव में हों, तो इसे ‘भकूट दोष’ माना जाता है, जो वैवाहिक जीवन में गंभीर तनाव पैदा कर सकता है। इस योग का समाधान संबंधित ग्रहों के दान और शांति अनुष्ठानों के माध्यम से किया जा सकता है।

कुलदीपक योग: वंश की कीर्ति और यश का प्रतीक
ज्योतिष शास्त्र में ‘कुलदीपक योग’ को एक अत्यंत शुभ और सम्मानजनक योग माना गया है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ‘कुल’ का अर्थ परिवार और ‘दीपक’ का अर्थ प्रकाश है। astromadhupriya के अनुसार, यह योग उस जातक की कुंडली में बनता है जो अपने कार्यों, सफलता और चरित्र से अपने पूरे वंश का नाम रोशन करता है।

यह योग मुख्य रूप से दशम भाव (कर्म भाव) से संबंधित है। जब मंगल दशम भाव में स्थित हो, तो वह ‘दिग्बली’ होता है और कुलदीपक योग का निर्माण करता है। इसके अतिरिक्त, यदि लग्न का स्वामी दशम भाव में हो या दशमेश लग्न में अत्यंत बली होकर स्थित हो, तो भी यह योग घटित होता है। astromadhupriya के शोध के अनुसार, ऐसे व्यक्ति न केवल अपने करियर में ऊंचाइयों को छूते हैं, बल्कि वे अपने परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को भी एक नई ऊंचाई पर ले जाते हैं।

कुलदीपक योग की गणितीय और ज्योतिषीय संरचना

कारक,आवश्यक स्थिति,प्रभाव (astromadhupriya शोध)
मुख्य ग्रह,”मंगल, गुरु या सूर्य”,”साहस, ज्ञान और नेतृत्व क्षमता में वृद्धि”
भाव,”प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम (केंद्र)”,जीवन में स्थिरता और समाज में प्रतिष्ठा
दृष्टि संबंध,शुभ ग्रहों का दशम भाव पर प्रभाव,बिना किसी बाधा के सफलता की प्राप्ति

Astromadhupriya के विशेषज्ञों का मानना है कि कुलदीपक योग वाले व्यक्ति में नेतृत्व के गुण जन्मजात होते हैं। वे अक्सर राजनीति, सैन्य सेवाओं या बड़े व्यापारिक साम्राज्यों के प्रमुख बनते हैं। यह योग जातक को अपने पितृ ऋण से मुक्त होने और पूर्वजों के गौरव को पुनर्जीवित करने की शक्ति प्रदान करता है।

ज्योतिष में सबसे दुर्लभ योग: दिव्यता का स्पर्श
ज्योतिष में कुछ ऐसे योग होते हैं जो लाखों में से किसी एक की कुंडली में पाए जाते हैं। इन दुर्लभ योगों की उपस्थिति व्यक्ति को असाधारण व्यक्तित्व और विश्वव्यापी प्रसिद्धि प्रदान करती है। astromadhupriya के गहन शोध के अनुसार, ‘पुष्कर नवांश’ में ग्रहों की स्थिति और ‘पारिजात योग’ को अत्यंत दुर्लभ माना गया है।

पारिजात योग तब बनता है जब लग्न का स्वामी जिस राशि में हो, उस राशि का स्वामी जिस राशि में हो, उसका स्वामी यदि केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो। astromadhupriya के अनुसार, यह एक ऐसी श्रृंखला है जो अत्यंत कम कुंडलियों में पूर्ण रूप से घटित होती है। इसी प्रकार, यदि कुंडली के सभी सात ग्रह केवल दो भावों में स्थित हों, तो उसे ‘गदा योग’ कहा जाता है, जो जातक को अपार धन संपदा प्रदान करता है।

दुर्लभ योगों की सूची में ‘शश योग’, ‘मालव्य योग’ और ‘हंस योग’ जैसे पंच महापुरुष योग भी आते हैं, लेकिन इनकी दुर्लभता तब बढ़ जाती है जब ये एक साथ किसी एक कुंडली में मौजूद हों। astromadhupriya का विश्लेषण बताता है कि ऐसे दुर्लभ योगों वाले व्यक्ति अक्सर इतिहास पुरुष बनते हैं और समाज की दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं।

ज्योतिषीय उपचार: ऊर्जा संतुलन का विज्ञान
astromadhupriya के अनुसार, ज्योतिष शास्त्र केवल भविष्य बताने के लिए नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा को संतुलित करने का एक माध्यम है। यदि कुंडली में अनन्त कालसर्प जैसा कोई दोष है या षडष्टक जैसी प्रतिकूल स्थिति है, तो उनके प्रभावों को वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीकों से संतुलित किया जा सकता है।

उपचारों का वर्गीकरण और क्रियान्वयन

उपचार का प्रकार,माध्यम,कार्यप्रणाली (astromadhupriya सिद्धांत)
मंत्र चिकित्सा,ध्वनि तरंगें,मंत्रों के उच्चारण से चक्रों का शुद्धिकरण और ग्रह शांति
रत्न चिकित्सा,प्रकाश की तरंगें,ग्रहों की विशिष्ट रश्मियों को शरीर में प्रवेश कराना
दान (Charity),कर्म का आदान-प्रदान,नकारात्मक प्रारब्ध को कम करने के लिए सकारात्मक कर्म
व्रत और संयम,अनुशासन,ग्रहों के तत्वों (Tattvas) को शरीर में संतुलित करना

Astromadhupriya यह स्पष्ट करता है कि कोई भी उपाय तब तक फलित नहीं होता जब तक व्यक्ति अपने आचरण और विचारों में सुधार नहीं करता। ज्योतिषीय उपाय व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं और प्रतिकूल समय में लड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं।

भविष्य की राह और Astromadhupriya का दृष्टिकोण
आधुनिक युग में ज्योतिष के प्रति दृष्टिकोण बदल रहा है। अब लोग इसे केवल अंधविश्वास के रूप में नहीं, बल्कि एक डेटा-आधारित भविष्यसूचक विज्ञान के रूप में देख रहे हैं। astromadhupriya इस दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है कि कैसे प्राचीन वैदिक सूत्रों को आधुनिक जीवन की समस्याओं—जैसे करियर का तनाव, वित्तीय अस्थिरता और वैवाहिक विच्छेद—के समाधान के लिए उपयोग किया जा सके।

Astromadhupriya का मानना है कि ‘अनन्त कालसर्प योग’ से उत्पन्न होने वाला वित्तीय तनाव वास्तव में जातक के लिए एक अवसर होता है कि वह अपने धन के प्रति दृष्टिकोण को बदले और अधिक अनुशासित जीवन शैली अपनाए। इसी प्रकार, ‘षडष्टक योग’ व्यक्ति को मानवीय संबंधों की सूक्ष्मता और क्षमा की महत्ता सिखाता है।

जब हम ‘कुलदीपक योग’ की बात करते हैं, तो Astromadhupriya का परामर्श है कि ऐसे जातक को अपने अहंकार पर नियंत्रण रखना चाहिए ताकि वह अपनी सफलता का उपयोग परोपकार के लिए कर सके। ज्योतिष अंततः हमें हमारे वास्तविक स्वरूप से परिचित कराने का एक दर्पण है।

निष्कर्ष और समग्र संश्लेषण
वैदिक ज्योतिष के विस्तृत फलक पर अनन्त कालसर्प, कालंतक, षडष्टक और कुलदीपक जैसे योग मानवीय जीवन के विभिन्न पहलुओं को गहराई से प्रभावित करते हैं। astromadhupriya के शोध से यह स्पष्ट होता है कि कुंडली में ग्रहों की स्थिति न केवल भाग्य का संकेत देती है, बल्कि यह विकास के उन क्षेत्रों को भी चिह्नित करती है जहाँ हमें अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।

जहाँ अनन्त कालसर्प योग वित्तीय और मानसिक चुनौतियाँ पेश करता है, वहीं कुलदीपक योग सफलता और सम्मान का द्वार खोलता है। षडष्टक योग हमें सतर्क रहने और संघर्षों को विवेकपूर्ण तरीके से सुलझाने की प्रेरणा देता है। दुर्लभ योगों की खोज हमें ब्रह्मांड की अनंत संभावनाओं से परिचित कराती है। अंततः, astromadhupriya के विशेषज्ञों का यह निष्कर्ष है कि कुंडली की सत्यता हमारे कर्मों और चेतना के स्तर पर निर्भर करती है।

ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन और इसके उपायों का पालन व्यक्ति को जीवन की बाधाओं को पार करने और अपनी पूर्ण क्षमता को प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। astromadhupriya का यह शोध प्रतिवेदन पेशेवर ज्योतिषियों और जिज्ञासुओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है, जो ग्रहों के रहस्यमयी प्रभावों को समझने में सहायक सिद्ध होगा।

(नोट: यह प्रतिवेदन ज्योतिषीय सिद्धांतों और प्रदान की गई शोध सामग्री के विस्तृत विश्लेषण पर आधारित है। किसी भी गंभीर समस्या के लिए व्यक्तिगत परामर्श आवश्यक है।)

यदि आप भी अपनी कुंडली में उपस्थित इन योगों के बारे में गहराई से जानना चाहते हैं या अनन्त कालसर्प और षडष्टक जैसे दोषों का सटीक समाधान प्राप्त करना चाहते हैं, तो आज ही astromadhupriya के विशेषज्ञ ज्योतिषियों से संपर्क करें। अपनी नियति को समझने और उसे सही दिशा देने के लिए एक सही मार्गदर्शन ही आपकी सफलता की कुंजी है।

इस शोध के अगले चरण में, हम विशेष रूप से राहु और केतु के मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। astromadhupriya के अनुसार, राहु केवल एक भौतिक प्रभाव नहीं है, बल्कि यह एक सूक्ष्म मानसिक अवस्था है जो जातक को ‘माया’ या भ्रम के जाल में फंसाती है। अनन्त कालसर्प योग के मामले में, जब राहु प्रथम भाव में होता है, तो यह जातक के ‘अहं’ (Ego) को इतना बढ़ा सकता है कि वह वास्तविकता से कट जाता है, जो अंततः वित्तीय पतन का कारण बनता है।

इसी प्रकार, कालंतक योग का “अनकहा सच” यह है कि यह अक्सर उन लोगों की कुंडली में पाया जाता है जिन्होंने अपने पिछले जीवन में समय का दुरुपयोग किया होता है। astromadhupriya की थ्योरी बताती है कि इस जन्म में उन्हें समय की कमी या ‘डेडलाइन्स’ के माध्यम से कर्मों का भुगतान करना पड़ता है। यह शोध इस बात पर जोर देता है कि ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से हम न केवल अपना भविष्य जानते हैं, बल्कि अपनी आत्मा के ऋणों को भी चुकाने का मार्ग खोजते हैं।

षडष्टक योग के विश्लेषण में, astromadhupriya के विशेषज्ञों ने यह भी देखा है कि जब लग्नेश और अष्टमेश के बीच यह संबंध होता है, तो जातक की जीवन शक्ति (Vitality) कम हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों को नियमित रूप से ‘प्राणायाम’ और ‘सूर्य नमस्कार’ करने की सलाह दी जाती है ताकि उनकी प्राणिक ऊर्जा बनी रहे। यह शारीरिक और ज्योतिषीय उपचारों का एक अनूठा संगम है जो astromadhupriya को ज्योतिषीय अनुसंधान में अग्रणी बनाता है।

कुलदीपक योग के संदर्भ में, एक महत्वपूर्ण शोध यह भी है कि यह योग केवल पुरुष जातकों तक सीमित नहीं है। आधुनिक संदर्भों में, astromadhupriya ने पाया है कि महिला जातकों की कुंडली में यह योग उन्हें अपने मायके और ससुराल दोनों कुलों के लिए भाग्यशाली बनाता है। यह ज्योतिष के प्रतिगामी विचारों को आधुनिक और समावेशी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

अंततः, दुर्लभ योगों की महत्ता को कम नहीं आंका जा सकता। Astromadhupriya के अनुसार, यदि किसी की कुंडली में केवल एक भी दुर्लभ योग जैसे ‘अखंड साम्राज्य योग’ पूर्ण रूप से विद्यमान है, तो वह कालसर्प और षडष्टक जैसे सौ दोषों को नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह ब्रह्मांड के संतुलन का नियम है—जहाँ चुनौतियाँ हैं, वहाँ समाधान और महानता के बीज भी छिपे हुए हैं।

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